महंगाई पर आस्था पड़ रही है भारी

राजू रंजन दुबे बिक्रमगंज रोहतास

 

बिक्रमगंज । चार दिन तक चलने वाला छठ महापर्व कल (बुधवार) को नहाय-खाय के साथ शुरू होकर गुरुवार को खरना भी व्रतियों द्वारा किया गया । व्रती शुक्रवार को दिन भर उपवास रख कर संध्या में खरना करेंगे। कल अस्ताचल गामी भगवान सूर्य को पहला अर्घ्य अर्पित किया जाएगा। इसके दूसरे दिन प्रात: उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के बाद व्रती पारन करेंगे।

वैसे तो छठ पर्व की तैयारी दिवाली के बाद से ही शुरू हो जाती है। बचपन में एक कहावत सुनते थे। ‘बीजे बीस दिवाली, सुकरातिए छवे छठ, छठे आठे गंगा स्नान, वहां से आएब थ काटब धान ‘ इस कहावत में विजयादशमी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा मां (गंगास्नान) के समय का कवित्वमय उल्लेख है। तात्पर्य यह कि विजया दशमी के बीस दिन बाद दिवाली ,दिवाली के कल होकर सुकराती और सुकराती के छठे दिन छठ और फिर इसके आठवें दिन कार्तिक पूर्णिमा का गंगा स्नान का मूहूर्त आता है।

विजया दशमी बीतते ही लोक मानस में दिवाली और छठ का उत्साह कुलांचे मारने लगता है। खासकर बच्चों में, क्योंकि छठ में उन्हें नये कपड़े पहनने को मिलते हैं न ! अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार दीपावली के बाद लोग छठ पूजा की तैयाली शुरू कर देते हैं। पहले सूप और डाला के लिए दौउड़ा या ढकिया का जुगाड़ किया जाता है। फिर धीरे- धीरे फल- फूल और अन्य अर्घ्य सामग्रियां जुटाते-जुटाते छठ का मुहुर्त आ ही धमकता है।

इस बार छठ पर्व की आस्था कोरोना के कहर और महंगाई के असर पल भारी पड़ रहा है। मिट्टी का हाथी और तीन कुरबार (घड़ा) का सेट 300 रुपये में मिल रहा है। पिछले साल इसकी कीमत दो सौ रुपये थी। आदी, ओल, हल्दी, मूली, सुथनी, नारियल फलों, गागर नींबू, गन्ने और अरबी के पौधे से हाट-बाजार सजा हुआ है। लोग अपनी जरूरतें की चीजें बाजार से खरीद कर ला चुके हैं। गांव में पहले ये चीजें मुफ्त मे मिल जाती थीं। लोग एक-दूसरे को अपने खेत से मूली, हल्दी, अरबी, ओल, आद, ईंख, नींबू आदि मुफ्त देकर छठ पर्व के पुण्य के भागी बनते थे।

मुझे अच्छी तरह याद है, जिस किसान के दरवाजे पर गाय या भैंस दूध दे रही होती थी, वह दूध दूहने के बाद दूध से भरी बाल्टी और ग्लास लेकर दरवाजे पर बैठ जाता था और खरना की सुबह दूध मांगने आए व्रतियों को एक-एक ग्लास दूध तबतक बांटता रहता जबतक पूरी बाल्टी खाली न हो जाए। खुद के लिए वह शाम के दूध का उपयोग करता था। आज खरना की सुबह व्रतियों को 40 से 45 रुपये लीटर दूध खरीदना पड़ा है।

इस साल 50 रुपये में मिलने वाला सूप 100 रुपये और डेढ से दो सौ रुपये का ढकिया ढाई से तीन सौ रुपये तक बिका है। ईंख की फसल इसबार बाढ़ से पूरी तरह बर्बाद हो गई। लिहाजा बाहर से ईंख मंगा कर गांव मे 50 से 90 रुपये जोड़ा, केला का घौद ढाई से तीन सौ रुपये और खुदरा 40 से 50 रुपये दर्जन बिक रहा है। सेब 100 से 120 रुपये, नारंगी और अनार 80 से 100 रुपये किलो की दर से बाजार में बिक रहा है।

पिछले साल 15 से 20 रुपये अदद की दर से बिकने वाला नारियल इसबार 30से 50 रुपये अदद बिकने लगा है। सुथनी और शकरकंद भी इस महंगाई मे पीछे नहीं रहा। इसकी कीमत भी 80 से 100 रुपरे प्रति किलो है। हल्दी और आदी का पौधा 100 से 120 रुपये किलो बिक रहा है। अर्घ्य की इन जरूरी सामग्रियों की खरीद के लिए हाट-बाजार में भीड़ उमड़ पड़ी है। लगता है छठ पर्व की आस्था महंगाई पर भारी पड़ रही है ।