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बिहार बोर्ड संस्कृत तृतीय पाठ-अलसकथा, सृजनधारा की प्रस्तुति,

"जीवन में विकास के लिये व्यक्ति का कर्मठ होना आवश्यक"

उपदेशात्मक लघुकथा के रूप में विख्यात मैथिल कोकिल विद्यापति द्वारा रचित पुरुषपरीक्षा का अंशविशेष है-अलसकथा।इसमें आलस्य नामक रोग के निवारण की प्रेरणा दी गई है।जो व्यक्ति काम नहीं करना चाहता है यानि निकम्मा है, उसे आलसी कहा जाता है।आलसी व्यक्ति अपने जीवन में सक्रिय नहीं होता है तथा अपना काम भी समय पर पूरा नहीं करता है।इस स्वभाववाले व्यक्ति काम से बचने के बहाने ढूंढते हैं या अपना काम दूसरों के सहारे पूरा करते हैं।
       अकर्मण्यों में यानि दुखी व्यक्तियों में आलसियों का पहला स्थान है।इनका मुख्य सिद्धांत भूखें रहना अच्छा है, किन्तुक कोई काम नहीं करना है।अर्थात् आलसी व्यक्ति पेट की आग(क्षुधा की अग्नि)सह लेते हैं, किन्तु किसी भी परिस्थिति में श्रम करना नहीं चाहते हैं।
आलसियों के माध्यम से शिक्षा दी गई है कि उनका भरण-पोषण दयालुओं की दया के बिना संभव नहीं है।आलसी काम नहीं करते, ऐसी स्थिति में कोई दयावान ही उनके जीवन का निर्वाह कर सकता है।अतएव वे आत्मनिर्भर न होकर दूसरों पर निर्भर होते हैं।
          अलसकथा का संदेश है कि आलस्य एक महान् रोग है।आलसी का सहायक प्रायः कोई नहीं होता।अतएव जीवन में समग्र विकास के लिए आलस्य को त्यागकर व्यक्ति को कर्मठ बनना पडेगा, उद्यमी बनना पडेगा।


   डा०सुशील नारायण तिवारी
                प्राचार्य
बी०डी०बी०उच्च विद्यालय सह इंटर कॉलेज, पचबेनिया, सीवान

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