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आप सभी को अन्तर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस की हार्दिक बधाई: पृथ्वीराज हेम्ब्रम


जमुई जिला ब्यूरो बीरेंद्र कुमार की रिपोर्ट

आज अन्तर्राष्ट्रीय मूलनिवासी-आदिवासी दिवस है। इस अवसर पर भारत के सभी मूलनिवासियों ( अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़े वर्गों एवं धर्मान्तरित अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों )को ढेर सारी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं!

               दुनिया भर के मूलनिवासियों के लिए घोषित अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार ,1948ई को लागू करने और उनके संरक्षण के लिए 1982ई में संयुक्त राष्ट्र-संघ ने एक कार्यदल UNWGIP (United Nations Working Group on Indigenous Populations) या एक उप-आयोग का गठन किया था।उसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 ई को हुई थी। इसलिए संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा 1994 ई से प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को “ अन्तर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस” अपने कार्यालय सहित सभी सदस्य देशों को मनाने का निर्देश जारी किया गया है।

       संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह अनुभव किया था कि 21वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों के आदिवासी समाज गोरे लोगों के कारण गरीबी, भूखमरी, ऊंच-नीच, रंग -विभेद,शोषण, उपेक्षा, अपमान, अपनी जमीन से बेदखली,बेरोजगारी, बंधुआ मजदूरी एवं बाल मजदूरी जैसी समस्याओं के शिकार हैं।इसलिए 1993 ई में UNWGIP कार्य-दल के 11वें अधिवेशन में मूलनिवासी घोषणा -पत्र प्रारूप को मान्यता मिली और उसी अधिवेशन में 1994 ई को “मूलनिवासी वर्ष” एवं प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को “मूलनिवासी दिवस”मनाने की घोषणा की गई।

              मूलनिवासियों को अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए और उनकी भाषा, संस्कृति एवं इतिहास के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त ,1994 को स्वीटजरलैंड के जेनेवा शहर में विश्व के मूलनिवासी प्रतिनिधियों का “प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस” सम्मेलन का आयोजित किया था।आदिवासियों की संस्कृति, भाषा एवं उनके अधिकारों को सभी प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया और उनके सभी मानवीय अधिकारों के संरक्षण करने के संकल्प की पुष्टि कर दी गई। संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा दुनिया के मूलनिवासियों को यह वचन दिया गया कि --“हम आपके साथ हैं”।

       प्राचीन काल से मूलनिवासियों का जीवन जल, जमीन एवं जंगल से जुड़ा रहा है। उसमें समय के साथ-साथ बदलाव हुए हैं और यह समाज भी बदला है। किन्तु आज भी मूलनिवासी समाज के बहुसंख्यक लोगों का जीवन जल, जमीन और जंगल पर निर्भर है। पूरी दुनिया में गोरे लोगों और भारत में अंग्रेजों, मनुवादी शोषकों, जमींदारों तथा महाजनों के खिलाफ अगर आदिवासियों ने हथियार उठाये थे तो इसका बड़ा कारण था-

1.जंगल एवं जमीन से जुड़े अपने अधिकारों की रक्षा करना, 

2.महाजनी शोषण-उत्पीड़न एवं अपमान को खत्म करना, 

3.अपनी संस्कृति, भाषा एवं इज्जत- आबरू की रक्षा करना।

            भारत में संविधान के लागू होने के बावजूद आज भी ये समस्याएं प्रमुख रूप से कायम हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में अनेक कानूनी प्रावधानों एवं संरक्षण के बावजूद मनुवादी सामंती शक्तियों, पूंजीपतियों एवं सवर्णों के द्वारा मूलनिवासी बहुजन समाज के साथ शोषण-उत्पीड़न, ऊंच-नीच, छुआछूत, षड्यंत्र और धोखाधड़ी जारी है।उन्हें कानूनी एवं गैर कानूनी तरीके से जल,जमीन, जंगल और संवैधानिक अधिकारों से बेदखल किया जा रहा है।

               भाजपा और आरएसएस द्वारा तो मूलनिवासी या आदिवासी के स्थान पर वनवासी कह कर उनकी पहचान को ही छीन लिया जा रहा है। उन्हें ब्राह्मणवादी- हिन्दू विचारधारा में लाने के लिए अनेक संस्थाओं को बना कर जनजाति क्षेत्रों में संचालित किया जा रहा है ताकि उन्हें अपनी भाषा, परम्परा और संस्कृति से अलग किया जा सके। भाजपा की सरकार ने तो नये कानूनी प्रावधान लाकर विकास के नाम पर उनकी जमीन-जंगल को पूंजीपतियों के हाथ में सौंपने का फैसला कर लिया है। सोनभद्र में जनजातियों की जमीन दबंगों द्वारा कब्ज़ा कर लेने और उसका विरोध करने पर सरेआम उनकी हत्या कर दी गई।मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो मूलनिवासी- आदिवासियों पर अमानवीय जुल्म-उत्पीड़न, हिंसा और बलात्कार के शिकार वर्षों से किए जा रहे हैं तथा निर्दोष लोगों को जेल भेजे जा रहे हैं।

      हमें आदिवासी समुदाय के साथ एकता और भाईचारे की नींव रखने की आवश्यकता है। उनके साथ-साथ पूरे मूलनिवासी-बहुजनों को अपमान, ऊंच-नीच, अन्याय, उत्पीड़न,बेरोजगारी,बंधुआ मजदूरी, अशिक्षा से मुक्ति की जरूरत है, जिसका केवल एकमात्र रास्ता है-- शिक्षा, संगठन और संघर्ष। अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़े वर्ग एवं अल्पसंख्यक समुदाय के लोग जबतक एक दूसरे से अलग -अलग रहेंगे, एक दूसरे के साथ भाईचारे का सम्बन्ध कायम नहीं करेंगे, एक दूसरे को शिक्षित और संगठित नहीं करेंगे, विभिन्न प्रकार के संघर्षों में एक -दूसरे को साथ नहीं देंगे,तब तक भारत के मूलनिवासी बहुजन समाज की तमाम समस्याओं से मुक्ति संभव नहीं है।

अतः शहीद तिलकामांझी, बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, चांद- भैरव सहित लाखों मूलनिवासियों की कुर्बानियों एवं अपने बहुजन नायकों के सपनों को साकार करने के लिए हमारे लिए यह संकल्प लेने का दिवस है। हम आज संकल्प लें कि भारत को सही अर्थों में लोकतांत्रिक, समतामूलक एवं धर्मनिरपेक्ष देश बनाएंगे और सभी समस्याओं की जड़ें ब्राह्मणवाद -पूंजीवाद से इसे मुक्त कर मूलनिवासी बहुजन भारत का निर्माण करेंगे।

 जय मूलनिवासी! जय बिरसा! जय भीम।

            पृथ्वीराज हेम्ब्रम 

           JMM( बिहार)

            शह

       

SC, ST, OBC, MI मानव मुक्ति संघ2

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