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बहुजन समाज के महानायक, विचारक एवं लेखक ललई सिंह यादव की मनाई गई 110 जयंती


जमुई जिला ब्यूरो वीरेंद्र कुमार की रिपोर्ट

दिनांक 01 सितंबर,2021ई को बहुजन समाज के महानायक, महान विचारक एवं मार्गदर्शक, महान लेखक और समाज सुधारक ,पेरियार ललई सिंह यादव उर्फ पेरियार ललई बौद्ध की 110 वीं जयंती है। इस शुभ अवसर पर भारत के सभी नागरिकों और विशेषकर मूलनिवासी-बहुजन समाज के लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

 उनका जन्म 1 सितम्बर 1911 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में कठारा गांव में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता गुज्जू सिंह यादव एक कर्मठ आर्य समाजी थे। इनकी माता का नाम मूलादेवी थी।ललई सिंह यादव ने 1928ई में उर्दू के साथ हिन्दी से मिडिल पास किया। 1929 ई  से 1931 ई तक ललई यादव फाॅरेस्ट गार्ड रहे। 1931 में सरदार सिंह यादव की बेटी दुलारी देवी के साथ उनका विवाह हुआ था। 1933 ई में  वे  सशस्त्र पुलिस कम्पनी,जिला मुरैना (म.प्र.) में कॉन्स्टेबल पद पर भर्ती हुए। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने 1946 ई में पुलिस एण्ड आर्मी संघ ,ग्वालियर की स्थापना की और वे उसके अध्यक्ष चुने गए।

          29 मार्च 1947 को ललई यादव को पुलिस व आर्मी में हड़ताल कराने के आरोप में धारा 131 भारतीय दण्ड विधान (सैनिक विद्रोह) के अंतर्गत साथियों के साथ राज-बन्दी बनाया गया। 6 नवम्बर 1947 को स्पेशल क्रिमिनल सेशन जज ग्वालियर ने उन्हें 5 साल सश्रम कारावास और पाँच रूपये अर्थ दण्ड का सर्वाधिक दण्ड दिया क्यों कि वे ग्वालियर नेशनल आर्मी के अध्यक्ष हाई कमाण्डर थे। 12 जनवरी 1948 को सिविल साथियों के साथ वे रिहा होकर बाहर आए।

        उसके बाद वे अध्ययन में जुटे गए। इसी दौरान उन्होंने एक के बाद एक ब्राह्मण धर्म ग्रंथों जैसे स्मृति, पुराण और  रामायण एवं अन्य ग्रंथों का अध्ययन किया। ब्राह्मणवादी हिन्दू शास्त्रों में व्याप्त घोर अंधविश्वास, षड्यंत्रों और पाखण्डों को पढ़कर वे बहुत आक्रोशित हुए। सभी धर्म- ग्रंथों में ब्राह्मणों की महिमा का बखान और पिछड़े शोषित समाज की मानसिक दासता के षड़यंत्र से वे काफी व्यथित हो उठे। ऐसी स्थिति में उन्होंने ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म छोड़ने का मन भी बना लिया। 

             दुनिया के विभिन्न धर्मों का अध्ययन करने के बाद उनमें वैज्ञानिक बौद्धिक चेतना विकसित हुईं और वे बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए। उन्हें समझ में आ गयी थी कि बड़ी चालाकी और षड्यंत्र से शोषित शूद्र समाज के दो वर्ग बना दिए गए हैं। एक सछूत-शूद्र और दूसरा अछूत-शूद्र। उन्होंने समझ लिया था कि शूद्र तो शूद्र ही है फिर भी उनका विभाजन और उनमें ऊंच-नीच की भावना। अपने जीवन संघर्ष के क्रम में वैचारिक चेतना से लैस होते हुए उन्होंने यह माना था कि इस दुनिया में मानवतावाद ही सर्वोच्च मानव मूल्य है।उनका कहना था कि सामाजिक विषमता का मूल कारण वर्ण एवं जाति व्यवस्था हैं जो  वेदों,स्मृतियों, पुराणों, रामायण,गीता, महाभारत आदि ग्रंथों से ही पोषित है। सामाजिक विषमता का विनाश सामाजिक सुधार से नहीं,अपितु इस धार्मिक ग्रंथों द्वारा बनाई गई व्यवस्था से अलग होने में ही निहित है।

        अब तक उन्हें यह स्पष्ट हो गया था कि विचारों के प्रचार-प्रसार का सबसे सबल माध्यम लघु साहित्य ही हो सकता है।यह कार्य अपने हाथ में लेकर उन्होंने प्रकाशन की ओर बहुत ध्यान दिया। दक्षिण भारत के महान क्रान्तिकारी पेरियार ई. वी. रामस्वामी नायकर उस समय उत्तर भारत में कई दौरे किए थे। ललई यादव इनके सम्पर्क में आए।पेरियार रामास्वामी नायकर के सम्पर्क के बाद उन्होंने उनकी लिखित ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ में विशेष अभिरूचि दिखाई। साथ ही उन्होंने इस किताब का खूब प्रचार-प्रसार किया। 1जुलाई 1968 में पेरियार रामास्वामी नायकर की अनुमति के बाद ललई यादव ने उनकी रामायण को हिंदी में छापने की बातें सोची। जुलाई 1969 ई में उनकी किताब ॑सच्ची रामायण ' छपकर तैयार हो गई । इसके प्रकाशन से सम्पूर्ण उत्तर पूर्व और पश्चिम भारत में एक तहलका-सा मच गया।

लेकिन यूपी सरकार ने 8 दिसम्बर 69 को किताब जब्त करने का आदेश दे दिया। सरकार का मानना था कि यह किताब भारत के कुछ नागरिक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जान-बूझकर चोट पहुंचाने तथा उनके धर्म एवं धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने के लक्ष्य से लिखी गई है।इस आदेश के खिलाफ प्रकाशक ललई सिंह यादव ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इस केस की सुनवाई के लिए तीन जजों की स्पेशल फुल बैंच बनाई गई। तीन दिन की सुनवाई के बाद सच्ची रामायण के जब्त के आदेश को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।

‘सच्ची रामायण’ का मामला अभी चल ही रहा था कि 10 मार्च 1970 में एक और किताब सम्मान के लिए ‘धर्म परिवर्तन करें’ (जिसमें डाॅ. अम्बेडकर के कुछ भाषण थे) और ‘जाति भेद का उच्छेद’ 12 सितम्बर 1970 को सरकार ने जब्त कर लिया।इसके लिए भी ललई सिंह यादव ने एडवोकेट बनवारी लाल यादव के सहयोग से मुकदमें की पैरवी की। मुकदमे में उनकी जीत हुई और उसकेे बाद 14 मई 1971 को यूपी सरकार ने हारकर इन किताबों के जब्त करने के अपने आदेश को निरस्त कर दिया। 

        इसके बाद ललई सिंह यादव की किताब ‘आर्यों का नैतिक पोल प्रकाश’ के खिलाफ 1973 ई में मुकदमा चला। यह मुकदमा उनके जीवन पर्यन्त चलता रहा।पेरियार ललई सिंह यादव ने हिंदी में पाँच नाटक लिख थे----

1.अंगुलीमाल नाटक

2.शम्बूक वध

3.सन्त माया बलिदान

4.एकलव्य

5.नाग यज्ञ नाटक

इसके अतिरिक्त उन्होंने 1926 में लिखित स्वामी अछूतानन्द के अनुपलब्ध नाटक ‘सन्त माया बलिदान’ का पुनर्लेखन भी  किया।

नाटकों के अलावा उन्होंने तीन वैचारिक पुस्तकें लिखीं थीं----

1. शोषितों पर धार्मिक डकैती

2. शोषितों पर राजनीतिक डकैती

3. सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो?

         साहित्य के प्रकाशन और अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई के लिए उन्होंने एक के बाद एक तीन प्रेस खरीदे थे। शोषित-पिछड़े समाज में स्वाभिमान तथा सम्मान को जगाने और उनमें व्याप्त अज्ञानता,अंधविश्वास, जातिवाद तथा ब्राह्मणवादी परम्पराओं एवं संस्कृति को ध्वस्त करने के उद्देश्य से उन्होंने अपना सारा जीवन लघु साहित्य के प्रकाशन  में लगा दिया।

‘सच्ची रामायण’के खिलाफ अपील हाईकोर्ट में हारने के बाद यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में अपील दायर कर दी थी। यहाँ भी ललई सिंह यादव की सच्ची रामायण की जीत हुई।

            बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की 14 अक्टूबर, 1956 में बौद्ध धर्म ग्रहण करने की घोषणा से ललई यादव बेहद खुश हुए। उनका बौद्ध धर्म की तरफ रूझान था और वे बौद्ध धर्म ग्रहण करना चाहते थे। वे डॉ. अम्बेडकर द्वारा आयोजित बौद्ध धर्म दीक्षा ग्रहण समारोह में जाना चाहते थे ,लेकिन गंभीर अस्वस्थता और खून की उल्टी होने के कारण 14 अक्टूबर को दीक्षा-भूमि नहीं जा सके। लेकिन 21 जुलाई, 1967 को उन्होंने कुशीनगर जाकर महास्थविर भिक्षु चंद्रमणि के हाथों से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। बौद्ध धम्म दीक्षा ग्रहण करने बाद ललई सिंह यादव ने एक सार्वजनिक घोषणा की थीं कि ‘आज से मैं मनुष्य हूँ, मानवतावादी हूँ, आज से मैं सिर्फ ललई हूँ। अब मैं कुँवर, चौधरी, सिंह, यादव, अहीर आदि जाति मूल्यों-मान्यताओं से पूर्णतः मुक्त हूँ। अब मैं अपने नाम के साथ किसी भी प्रकार का जातिसूचक या सामंती शब्दावली का प्रयोग नहीं करूँगा।

            24 दिसम्बर, 1973 ई. को पेरियार ई.वी. रामास्वामी का निर्वाण हुआ। उन्होंने उनके निर्वाण के बाद 30 दिसम्बर 1974 ई को उनकी याद में महान स्मृति सभा आयोजित की थी, जिसमें दुनिया के कई महान चिंतक एवं बुद्धिजीवी आए थे और पेरियार साहेब के विचारों पर प्रकाश डाले थे।उस सभा में महानायक ललई ने भी अपना मत रखते हुए ब्राह्मणवादी धर्म और संस्कृति पर उसी तरह प्रहार किए थे जैसे पेरियार ईवी रामास्वामी करते थे। उस स्मृति सभा में उपस्थित कई लाख लोगों ने कहा- हमें हमारे पेरियार मिल गए। आज से हमारे नए पेरियार, पेरियार ललई होंगे। उसके बाद से वे पेरियार ललई के नाम से पुकारे जाने लगे।साथ ही वे उत्तर भारत के पेरियार कहे जाने लगे।

7 फरवरी 1993 ई को पेरियार ललई जी का परिनिर्वाण हो गया। तो आइए ,हम शोषित मूलनिवासी-बहुजन समाज को जागृत करने में  अपने सारे तन, मन और धन को अर्पित करने वाले महान योद्धा और नायक पेरियार ललई जी के प्रति शत-शत नमन और हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और उनके सपनों का समतामूलक भारत बनाने के लिए संघर्ष करें।

   जय फुले!      जय भीम!!        जय पेरियार ललई!!!

                   विलक्षण रविदास

                          संरक्षक

           बिहार फुले अम्बेडकर युवा मंच

          बहुजन स्टुडेंट्स यूनियन, बिहार

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