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भाइयों की लंबी उम्र के लिए रखा कर्मा-धर्मा का व्रत


बिक्रमगंज
(रोहतास)। बहनें अपने भाईयों की सलामती के लिए उपवास रहकर शुक्रवार को बहनों ने अपने भाइयों के लिए सलामती के लिए कर्मा-धर्मा की पूजा अर्चना की । अनुमंडल मुख्यालय अंतर्गत सभी प्रखंडों के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भाई के दिर्घायु के लिए कर्मा-धर्मा पूजा अर्चना हर्षोल्लास के साथ मनाया गया । यह पर्व बहनों के द्वारा भाई के दीर्घायु के लिए किया गया । पर्व को लेकर छोटी-छोटी बच्चियों में खुशी देखी गई । इस व्रत में बहनों ने दिनभर उपवास कर पांच तरह के फूल-पकवान आदि डालिया भर कर ब्राह्मणो से कर्मा-धर्मा की कथा सुनी । व्रत के दिन मोहल्ले की लड़कियां एक समूह के साथ गीत गाती हुई नदी एवं जलाशयों में स्नान करने गई ।

 स्नान करने के बाद फूल तोड़कर और कसाल यानी झूर लेकर घर आई और घर के समीप गड्डा खोदकर तलाब नुमा बनाकर तलाब को केले के थम एवं खजूर की डाली में फूल देखकर सजाया गया । सोशल डिस्टेंसिग के साथ महिलाओं ने कर्मा-धर्मा व्रत की कथा भी सुनी । वही कर्मा पूजा करने के बारे में ऐसे तो कई कहानी है । पंडित हरिशरण दुबे ने बताया कि कर्मा और धर्मा नामक दो भाई बहन बहुत ही प्रेम से बचपन गुजार रहे थे । कर्मा की शादी हो गई । उसकी पत्नी दूसरे को दुख देने वाली थी । 

एक दिन उसकी पत्नी घर के बाहर खाना पका रही थी और माड़ को धरती पर गिरा रही थी तब कर्मा ने अपनी पत्नी को कहा कि धरती मां के सीने पर गर्म माड़ मत उझलो लेकिन वह नहीं मानी । यह सब देखकर कर्मा घर से चला गया । उसके जाते गांव में तरह तरह की बीमारी व अकाल होने लगी । धर्मा जब घर आईं तो उसने अपने भाई को नही पाकर उसे ढूंढने निकल गई। रास्ते में पेड़ मिला वह भी सुख गया । पेड़ ने कहा जल्दी कर्मा को ढूंढ लाओ। 

 फिर नदी से पूछा नदी भी सुख गई। नदी ने कहा जल्दी कर्मा को बुलाओ। इसी तरह ढूंढते रेगिस्तान में चला गया। वहां कर्मा गर्मी से जल रहा था। धर्मा ने कहा चल मेरे भाई सब तुम्हारे बिना मर जायेंगे फिर कर्मा घर वापस आया और गांव में खुशहाली व नदी में पानी लौट आई। तब से लेकर हमलोग कर्मा त्योहार धूम धाम से मनाते आ रहे हैं ।

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