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सलीके से जो हवाओं में खुशबू घोल सकते हैं, अभी कुछ लोग बाकी है जो "हिंदी" बोल सकते हैं


उन्नाव से जिला ब्यूरो अवधेश कुमार की रिपोर्ट

हिन्दुस्तान की राष्ट्र भाषा हिन्दी प्रबुद्ध समाज‌ के तरफ हिकारत भरी‌ घृणा‌ की नजर से देखती हुयी भारी मन से लाचारी में आहें भरते हुये दिखावटी हिन्दी दिवस पर विवस मन से अन्तर्मन को झक झोर देने वाली ब्यवस्था को परिभाषित करते हुते परम्परा के परिचालन का हिस्सा बनकर चुप चाप असहाय लाचार होकर चली गयी। हिन्दी है हम वतन है हिन्दोस्ता हमारा?कितना अजीब लगता‌ है झूठ की बुनियाद पर साहित्य की हिन्दी ईमारत खडा करने का प्रोप गन्डा!

बेशर्मी भी शर्माती होगी इस देश की ब्यवस्था के किरदार को देखकर! जिस‌ देश में राष्ट्र भाषा‌ मेअदालती काम नही‌ होता। अदालतों के फैसले अंग्रेजी में होता‌ है।अदालतों , बैको, कम्पनियों ,का काम अंग्रेजी में होता है।जिस‌ देश में हिन्दी मे‌ लिखे गाड़ी के नम्बर प्लेट पर चालान होता है! जिस‌ देश के लोग नब्बे प्रतिशत हस्ताक्षर अंग्रेजी में करते है! ।जहां हिन्दी के लिये‌ दो का बटन दबाना पडता‌ है! जिस देश की अदालत में न्याय के लिये बहस हिन्दी में नहीं सुनी जाती !अदालत के फैसले‌‌ अंग्रेजी मे आते‌ है! 

हिन्दी अंग्रेजी की रखैल बन चुकी हो! यह भारत वर्ष ही दुनियां का पहला देश है‌ जहां राष्ट्र भाषा का खुलेयाम अपमान अपने ही लोग करते‌ है। सियासत के जहरीले नाग भी विष बमन गुलामी‌ की भाषा‌ मे‌ ही बाहर के देशों में करते‌ है। आजादी के बाद जब‌ देश का परिवेश बदला तब सब कुछ बदला लेकिन‌ गुलामी‌ की मानसिकता आज‌ भी कायम‌ है।अंग्रेजियत का जलवा आज भी बरकरार है। देश का हर काम‌ अंग्रेजी में हो रहा है। 

राष्ट्र भाषा हिन्दी हाशिये पर खड़ी सिसक रही है। किसी की भी हो सरकार हिन्दी की दुर्दशा बराबर है बरकरार?लोगों की सोच का समन्दर सरकार बदली तो सुनामी के तरफ‌ बढने लगा! मगर जैसे जैसे समय सरकता गया आस्था की लहरों में समाकर दुर्बयवस्था के साहिल से टकरा टकरा कर वापस हो जाने को मजबूर हो गया। झूठ की बुनियाद पर वादों का महल बनाने वाले सियासत के शहंशाह का वक्त भी रफ्ता रफ्ता अस्ताचल के तरफ जा रहा है। मगर हिन्दी की हिफाजत की बात तक इस सरकार में नहीं हो पाई। 

राष्ट्र भाषा निराशा के भंवर मे‌ चक्कर काट रही है !अपने वजूद को उर्दू भोजपूरी अवधी‌ में बांट रही है। दम तोड रही हिन्दी‌ हिन्द के आवरण में ही उपेक्षित है।यह केवल कागजी नहीं हर जगह‌ हो रहा परिलिक्षीत‌ है। हिन्दी माने कुछ नहीं! जो अंग्रेजी पढा वहीं शिक्षीत है। यह‌ हम‌ नही साहब देश के सरकारी दफ्तरों में अदालतों में चल रही कार्यवाही बता रही हैं। भरोशा‌ की नाव तो कब‌ की गर्त हो चुकी है! बहुत झेल लिये इस‌ बार नहीं यह शर्त लगा चुकी है । देखना‌ है आने‌ वाले कल मे हिन्द में हिन्दी के नुमाइंदे वंदे मातरम भी अंग्रेजी में बोलते हैं या हिन्दी की सुधि लेते हैं? गुजरे हिन्दी दिवस की बुझे‌ दिल‌ से देश वासियों को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

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