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देव शिल्पी और कला के देवता भगवान विश्वकर्मा जयंती के मौके पर देशभर में विश्वकर्मा पूजा मनाई गई।


उन्नाव जिला ब्यूरो चीफ अवधेश कुमार की रिपोर्ट

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को विश्वकर्मा पूजा का त्योहार मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन ही ऋषि विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। आज के दिन इंजीनियरिंग संस्थानों व फैक्ट्रियों-कारखानों व औजारों की पूजा की जाती है। 

विश्वकर्मा पूजा की विधि

आज के दिन ऑफिस, फैक्ट्री, वर्कशॉप, दुकान आदि के मालिक सुबह स्नान आदि करके भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा व यंत्रों व औजारों की विधि-विधानों से पूजा करते हैं।

इसी क्रम में आज क्षेत्र के विकासखंड फत्तेहपुर-चौरासी में विभिन्न जगह व संस्थान में पूजा व हवन किया। इसी कड़ी में नेशनल हेल्थ क्लब जीम ऊगू में नैमिष विश्वकर्मा नें पूरे परिवार वा अपने ईष्ट मित्रों व सगे संबंधियों के साथ हवन वा पूजन किया। पूजन में चन्द्र प्रकाश विश्वकर्मा, कौशलेंद्र प्रताप, नितिन यादव सौरभ,आयुष मिश्रा, राहुल सैनी, पुनित पाल, शशिकांत मिश्रा,प्रांचल,आशीष दीक्षित, अवधेश, शशांक, मुकुल गौड़, राहुल पटेल,मकसूदअली,अमित कुमार आदि क्षेत्र के सम्मानित सदस्य मौजूद रहे। तथा पूरे जनपद में अनेकों प्रतिष्ठानों में विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा पूरे विधि-विधान से की गई। 

विश्वकर्मा पूजा की कथा और महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि को संवारने की जिम्मेदारी ब्रह्मा जी ने भगवान विश्वकर्मा को सौंपी थी। ब्रह्मा जी को अपने वंशज और भगवान विश्वकर्मा की कला पर पूर्ण विश्वास था। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया तो वह एक विशालकाय अंडे के आकार की थी। 

उस अंडे से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई। कहते हैं कि बाद में ब्रह्माजी ने इसे शेषनाग की जीभ पर रख दिया।शेषनाग के हिलने से सृष्टि को नुकसान होता था। इस बात से परेशान होकर ब्रह्माजी ने भगवान विश्वकर्मा से इसका उपाय पूछा। भगवान विश्वकर्मा ने मेरू पर्वत को जल में रखवा कर सृष्टि को स्थिर कर दिया। भगवान विश्वकर्मा की निर्माण क्षमता और शिल्पकला से ब्रह्माजी बेहद प्रभावित हुए। तभी से भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला इंजीनियर और वास्तुकार मनाते हैं। भगवान विश्वकर्मा की छोटी-छोटी दुकानों में भी पूजा की जाती है।

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