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अपनी क़लम मे धार लगाओ बहुत अंधेरा है !डूबती नाव को पार लगाओ बहुत अंधेरा है

अपनी क़लम मे धार लगाओ बहुत अंधेरा है !

डूबती नाव को पार लगाओ बहुत अंधेरा है

मत रहो मौन अपना अस्तित्व मिटने वाला है!

समवेत स्वर में हुंकार लगाओ बहुत अंधेरा है!

छितर गए हैं लोग,भटक गए हैं इधर उधर!

एकजुटता की पुकार लगाओ बहुत अंधेरा है?


उन्नाव से जिला ब्यूरो अवधेश कुमार की रिपोर्ट

दुनियां ‌के मका़म पर निष्काम भाव लिये लोगों के दर्द को अपना फ़र्ज समझ कर ‌क़लम से तेवर देकर जागृत समाज‌ के सामने सच परोसने वाला पत्रकार आज आताताईयो,अपराधियो , आतंक वादीयो , सरकारी कर्मचारीयों अधिकारीयो ,तो कहीं सियासत के पुजारीयो के क्रुचक्र का शिकार हो रहा‌ है! पत्रकार असहाय वह बेचारा बनकर रहगया क़लम कार।जब करोना काल में अधिकांश लोग घरों में कैद थे तब क़लम कार पत्रकार समाचार दरवाजे़ दरवाजे़ अपनी जान को खतरा में डाल ख़बर बना रहा था।

 लोगों की दुर्दशा को दुनिया‌ के सामने अपनी मेहनत से बनाई ख़बर के माध्यम से सच्चाई का पर्दा फा़श कर रहा था दिखा रहा था। हमारे तमाम साथी अकाल मौत का शिकार हो गये! परिवार बे सहारा हो गया! मगर न सरकार को फ़िकर न समाज को? जिस सम्वेदनहीनता‌ नीचता के साथ करोना काल मे‌ लावारिस लाशों का तथा गंगा की रेती में लाशों के अम्मबार का सवाल खड़ा कर सभ्य समाज में अकेले ताल ठोकने का काम किया? इस‌ मदान्ध सरकार की आँख खोलने का काम किया! वह इस समाज का जागरूक पत्रकार ही हैं जो आज भी इसका खा़मियाजा़ भुगत रहा है।वह हिटलर शाही का शिकार हो गया। वर्तमान समय पत्रकार समाज के लिये इस सदी का सबसे बड़ी त्रासदी बनकर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो रहा है। लगातार पत्रकारों की हत्या हो रही है! रोजा़ना उत्पीड़न हो रहा है!।कहने को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ है! मगर सम्विधान के किसी अनुच्छेद में इसका कहीं उल्लेख नहीं? यह सब सियासत के चालबाजों द्वारा मुर्ख बनाने का शगू़फा़ है।बे मौत मरने का तोहफा़ है !दुनियां के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में आजादी के बाद जो बंटवारे का प्रचलन शुरू हुआ उसमें पत्रकार समाज भी बुरी तरह फंस गया।

शहर और ग्रामीण पत्रकारों में विभाजन की रेखा खिच गयी।शहर में रहने वाले कलमकार सरकार के सुबिधा भोगी बन गये।गांव में रहने वाले पत्रकारिता को मिशन बनाकर लोकहित मेंबियोगी बनकर योगी हो गये। इनके संकलित ख़बर से शहर से निकलने वाले अखबार सरकार के लिये आँख कान नाक बन गये! लेकिन गांव के अभाव ग्रस्त जीवन से क़लम को तेवर देकर नये कलेवर में इंसाफ़ के राह पर चलने वाला पत्रकार सबके उपेक्षा का शिकार हो गया!समय बदला जागरुकता कुलांचे मार रही है! शोशल मिडीया ऐसा प्लेट फा़र्म मिल गया कि अब किसी के पीछे घूमने की जरूरत नहीं! खुलेआम ललकारने का मौका मिला है!।इसी लिये सरकारी सुविधा भोगियों के क्रेज का सिंहासन हिला है।? यह सच है सबसे अधिक प्रताडना ग्रामीण पत्रकार झेल रहे है? इसका कारण है न सरकार पत्रकार मानती है! न अखबार? दो चक्की में पिस रहा है क़लम कार?

आज इस समाज को संगठित करने के लिये तमाम संगठन वजूद में आ चुके हैं। पत्रकार समाज के साथ हो रहे अन्याय का मुखर होकर विरोध कर रहे है। वक्त का तकाजा़ है पत्रकार साथियों जागरूक हो जाओ चाहे जिस भी संगठन में रहो सहयोग की भावना से सन्घे शक्ति कल युगे के सूत्रों को याद रखना! हा तमाम संगठन ब्यवसाय‌ भी बना लिये‌ उनसे सावधान रहना हैं।जब तक क़लम से तेवर देकर सच की ईबारत तहरीर करोगे? क़दम क़दम पर होशियार रहोगे!सियासतदारों का पहरेदार नहीं बनोगे?कुछ नहीं होगा! अब तक हुयी पत्रकारों की हत्या के षड्यंत्र में सियासतदार हर जगह शामिल रहे हैं। सतर्क नहीं हुवे तो वजूद खतरे में पड़ जायेगा! किसी भी पत्रकार साथी पर ज़ुल्म की खबर मिले चाहे वह किसी भी संगठन का हो सबको एक मंच पर आकर विरोध करना ही होगा! वरना इस प्रदुषित समाज मे हत्या उत्पीडन जैसी घटनाओं पर विराम नहीं लग सकेगा! जय पत्रकार समाज

  • उड़ने दो मिट्टी को आख़िर कब तक वो उड़ेगी?
  • हवाओं ने साथ छोड़ा तो जमीं पर ही गिरेगी?

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