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गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने वाले डॉ एसएन सुब्बाराव का हुआ निधन


अरवल जिला ब्यूरो वीरेंद्र चंद्रवंशी की रिपोर्ट

एक लड़का जो 13 साल की उम्र में अपने सहपाठियों से कहता कि हमें भी भारत छोड़ो आंदोलन के तहत स्कूल का बायकॉट करना चाहिए और उस उम्र में सैकड़ों विद्यार्थियों को स्वतंत्रता के उस महासंग्राम में आने को प्रेरित करता है । जीवन की शुरआत ही गांधी जी की छांव के साथ हुई,उनकी सादगी,उनकी सेवा,उस बच्चे पर ऐसे पड़ी की सन 1929 को जन्मा बच्चा,आजतक गांधी के आदर्शों की मिसाल बनकर जीता रहा ।

प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता डॉ एस एन सुब्बाराव यानि हमारे भाईजी ने आज आखरी सांस ली । हम सब खुश किस्मत रहे कि उन्हें देखा, उनके पास बैठकर पूरे एक दौर को सुना ही नही बल्कि महसूस किया है । आपको मालूम होना चाहिए आज वह इंसान चला गया,जिसने मुल्क की बुनियाद को बुना । जिस तरह देश के नेतागण,वैज्ञानिक,शिक्षक और दूसरे फन के माहिर मुल्क को बुन रहे थे,उसी तरह यह गांधीवादी कार्यकर्ता भी इंसान को मानवता,संविधान,अहिंसा के पाठ ही नही पढ़ाते, बल्कि इसके साथ साथ ईमानदारी से मेहनत करके काम करने की प्रेरणा दे रहे थे ।


सुब्बाराव जी ने अपने प्रयास से चम्बल में गांधी आश्रम बनाया और वहां रहकर गांव गांव साइकिल और पैदल जाकर खादी और अहिंसा का सन्देश दिया । उनके ही प्रयास से चम्बल में डाकुओ का सबसे महत्वपूर्ण समर्पण सम्भव हो पाया । उन्होंने हज़ारों डाकुओं से हथियार ही नही रखवाए बल्कि उनको चरखा थमाया,उनके परिवारों को आश्रम में रखा,पढ़ाया और मुख्यधारा में लाने का ऐतिहासिक काम किया ।


सुब्बाराव जी के यूथ कैम्प देश में ही नही विदेश में भी बहुत प्रसिद्ध थे और गांधी दर्शन पर देश की सीमाओं से परे जो दो ट्रेन चलाई गई थीं,जिसमें गांधी दर्शन का संगीत,विचार,भाषण,तस्वीर,फ़िल्म,सब चलते थे,उस ट्रेन की पूरी जिम्मेदारी भी सुब्बाराव जी की ही थी,जिसे उन्होंने अपने हुनरमंद हाथों से खूब निखारा ।


हम जब सोचते हैं कि एक जीवन मे क्या क्या करें । जब मुट्ठीभर कामों में मसरूफ होकर टहलते हैं कि वक़्त ही नही,तब सुब्बाराव जी जैसे लोग बताते हैं कि अगर इच्छाशक्ति हो तो पहाड़ जैसे कामों को भी कुछ सांसों में पूरा किया जाता है ।


जिन्हें गांधी स्पर्श का जादू देखना होता,वह उन्हें देख लेते । पूरे जीवन गांधी विचार,व्यवहार और उसके प्रचार के सिवा उन्होंने कुछ नही देखा । मुल्क में प्रेम,सद्भावना और एकता की रखी हुई बुनियाद को अपने कर्मो से खूब बढ़ाया । काशी विद्यापीठ ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी तो भारत सरकार ने पद्मश्री और तमाम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी उन्हें मिले, लाखों गांधीवादी कार्यकर्ताओं को उन्होंने तैयार किया,जो उनके बाद भी गाँधीमार्ग पर चलते रहेंगे ।


आज गम बहुत है, मगर एक बात की खुशी है कि अपने भरपूर जीवन मे उन्होंने हर पल गांधी जी को जिया और लोगों को उनका स्वाद बताया । उन्होंने जो 13 साल की उम्र में यज्ञ चुना था,वह आखरी सांस तक पूरा किया । अपने जीवन की आहुति उन्होंने मुल्क में प्रेम,सद्भावना,अहिंसा,खादी, एकता के रूप में दे दी । हम सबकी तरफ से आखरी सलाम सुब्बाराव जी,आने वाली नस्लें उनके संघर्षों को याद रखेंगी और दुनिया उन्हें सुक़ून से मुस्कुराकर याद करेगी कि एक सुब्बाराव थे,जो मानवता को सींचते थे,जो बच्चों की मुस्कुराहट,युवाओं के सुक़ून और बूढ़ों की शांति के लिए जीवन समर्पित कर गए । आपको सलाम और नमन 

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