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संविधान दिवस के अवसर पर अरवल व्यवहार न्यायालय में सेमिनार विधिक


जागरूकता कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया

अरवल कोर्ट एस एनबी राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकार के निर्देश पर बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकार पटना के पत्र के अनुपालन में व्यवहार न्यायालय परिसर में आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम के तहत संविधान दिवस सेमिनार सह विधि जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया ।सेमिनार का उद्घाटन अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी चतुर्थ राकेश कुमार राकेश, न्यायिक दंडाधिकारी आशीष कुमार अग्निहोत्री, न्यायिक दंडाधिकारी सुशील दत ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया ।इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता सियाराम शर्मा ने की ।इस अवसर पर अपने संबोधन में अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी चतुर्थ राकेश कुमार राकेश ने कहा कि 26 नवंबर 1949 को संविधान बना था ।किसी भी देश के सफल संचालन के लिए संविधान का निर्माण किया जाता है। हमारे संविधान निर्माण के पश्चात 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किया गया तथा 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। देश में सबसे बड़ा संविधान होता है। सभी देशों की अच्छाइयों को हमारे संविधान में सम्मिलित किया गया है। संविधान में मूल अधिकार के साथ-साथ अपने कर्तव्य को भी यह स्थापित किया गया है।

 हमें मूल अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य को भी नहीं भूलना चाहिए। संविधान हमें अपने व्यवहार कर्तव्य के बारे में बताती है। हम लोग संविधान के मूल भावना का पालन करें ।इस अवसर पर न्यायिक दंडाधिकारी आशीष कुमार अग्निहोत्री ने कहा कि संविधान किसी भी देश को चलाने के लिए बनाया जाता है। संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जिसके नियमों से सभी विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का बंटवारा किया गया है। विधायीक का काम कानून बनाना है तथा कार्यपालिका उसे लागू करती है एवं न्यायपालिका उसके बाद परीक्षा करती है। सभी के बीच शक्तियों का विभाजन का दस्तावेज संविधान है। आज ही के दिन 26 नवंबर 1949 को संविधान बनकर तैयार हुआ था ।इसी अवसर पर आज संविधान दिवस मनाया जाता है। 

इस अवसर पर न्यायिक दंडाधिकारी सुशील दत्त ने कहा हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था लेकिन संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। संविधान ही वह मूल दस्तावेज है जिससे किसी भी देश को सुचारू ढंग से चलाया जाता है। इस अवसर पर पैनल अधिवक्ता नंदकिशोर शर्मा ने कहा कि 26 नवंबर 1949 को संविधान बनकर तैयार हुआ था जो 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। इसमें मूलभूत अधिकार आर्टिकल 12 से 35 तक में वर्णन है। आर्टिकल 32 में मूलभूत अधिकारों के हनन पर सुप्रीम कोर्ट एवं आर्टिकल 226 में उच्च न्यायालय में जा सकते हैं। शिक्षा का अधिकार मूल संविधान में मूलभूत अधिकार नहीं था, पर माननीय उच्च न्यायालय ने 1993 में इसे मूलभूत अधिकार का दर्जा दिए। इसी निर्णय के आलोक में 86वी संशोधन 2002 के द्वारा आर्टिकल 21a डालकर मूर्त रूप प्रदान किया गया। संविधान में मूलभूत कर्तव्य का भी वर्णन किया गया है। संविधान में इसका जिक्र मूल रूप से नहीं था।

 आपातकाल में सरदार सरवन सिंह कमेटी के सिफारिशों को लागू करने के लिए 42वा संविधान संशोधन के तहत सन 1976 में मूल कर्तव्य जोड़ा गया। 2009 में राइट टू एजुकेशन एक्ट लाकर आर्टिकल 111 को लागू करने की प्रयास हुई जिसके तहत 6 वर्ष से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा सरकार की जिम्मेदारी सरकार की है। इस अवसर पर पैनल अधिवक्ता विनोद कुमार, दिलचन साव, अनवर हुसैन, दीनानाथ रजक, राम जन्म सिंह अधिवक्ता वशिष्ठ नारायण, अनिल कुमार, राम सुभाग सिंह,अखिलेश्वर सिंह, उमेश चंद्र सिंह, पीएलबी राजू कुमार, इरफान आलम, न्यायालय कर्मी छोटेलाल सिंह, राजन कुमार ,अरविंद कुमार, मनीष कुमार सहित अन्य न्यायालय कर्मी उपस्थित थे।

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