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मानव जीवन में गृहस्थ आश्रम से महत्वपूर्ण कोई आश्रम नहीं है: जीयर स्वामी

  •  गृहस्थ आश्रम सर्वश्रेष्ठ : जीयर स्वामी


बिक्रमगंज
(रोहतास)भारत के महान मनीषी संत शिरोमणि श्री श्री 1008 श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज के परम शिष्य श्रीलक्ष्मी प्रपन्न श्री जीयर स्वामी जी महाराज बुधवार को स्थानीय शहर के धनगाई गांव के मां काली के भव्य नवनिर्माण मंदिर को लेकर मां काली के परिसर पहुंच स्वामी जी के सानिध्य में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा मां काली की पूजा अर्चना कर उनकी महाआरती की गई । साथ ही उसके उपरांत स्वामी जी महाराज धनगाई अस्पताल मैदान में प्रवचन स्थल पर पहुंच उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को कथा का रसपान कराया और साथ ही उपस्थित श्रद्धालुओं को आशीर्वचन प्रदान किए । स्वामी जी ने कथा को श्रवण कराते हुए श्रद्धालुओं से कहा कि मानव जीवन में गृहस्थ आश्रम से महत्वपूर्ण कोई आश्रम नहीं है । यह आश्रम गृहस्थ को धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरूषार्थ-फल प्राप्त कराता है । गृहस्थ जीवन में रहकर भी भगवान का सानिध्य सुगमता पूर्वक प्राप्त किया जा सकता है । समाज में अधिक संख्या गृहस्थों की है । जो गृहस्थ अपने को परमात्मा से जोड़ना चाहता है, उसे शास्त्र-वर्जित आहार-व्यवहार नहीं अपनाना चाहिए । जिस गृहस्थ के घर में छह प्रकार के सुख नहीं हैं, वह गृहस्थ कहलाने का अधिकारी नहीं है । गृहस्थ आश्रम से भिन्न ब्रह्मचर्य आश्रम और सन्यास आश्रम का पालन करना कठिन है । उपरोक्त बातें श्री लक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी ने शहर के धनगाई अस्पताल मैदान में प्रवचन करते हुए कहीं । स्वामी जी ने कहा कि सभी आश्रमों में गृहस्थ आश्रम श्रेष्ठ माना गया है । गृहस्थ आश्रम में छह सुख आवश्यक है । गृहस्थ आश्रम में सात्विक कर्मों से धन की वृद्धि होनी चाहिए । रोग मुक्त जीवन होना चाहिए । सुन्दर स्त्री होनी चाहिए । सिर्फ रुप-रंग से नहीं बल्कि आचरण और वाणी से भी सुन्दर होनी चाहिए । पुत्र आज्ञाकारी होना चाहिए । अर्थ का उपार्जन वाली शिक्षा अध्ययन होना चाहिए । स्वामी जी ने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए अगर ये सुख उपलब्ध नहीं हैं, तो अपने को सच्चा गृहस्थ नहीं मानें । गृहस्थ आश्रम में पुत्र की चर्चा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि अगर चार भाई हैं और एक भाई को भी संतान है तो अन्य तीनों भाई भी पुत्र के अधिकारी हो जाते हैं । पुत्र से अभिप्राय केवल तनय से नहीं बल्कि भाई के पुत्र भी आप के पुत्र हुए । गृहस्थ आश्रम के लिए कोई निर्धारित वस्त्र है । वे किसी तरह का मर्यादित वस्त्र धारण कर सकते हैं । लेकिन संत का आचरण और वस्त्र उनके पहचान होते हैं । स्वामी जी ने कहा कि धर्म के दस लक्षण हैं । यानि धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध ये धर्म के लक्षण हैं । स्वच्छता की चर्चा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि स्वच्छता का तात्पर्य बाहरी और भीतरी स्वच्छता से है । भगवान बार-बार कहते हैं कि जिसका मन निर्मल रहता है, उसे ही मैं अंगीकार करता हूं । सार्वजनिक स्थलों पर मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए । गुरु और भगवान का स्मरण करते हुए पूरब मुंह करके स्नान करना चाहिए । स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य को तीन तरह का यज्ञ प्रतिदिन करना चाहिए । देव यज्ञ, ऋषि यज्ञ और पितृ यज्ञ । देव यज्ञ से अभिप्राय स्नान-ध्यान कर भगवान का नाम कीर्तन करने से है । वैदिक सद्रग्रंथों को स्वाध्याय और मनन ऋषि यज्ञ है । पितृ यज्ञ से अभिप्राय अतिथि सेवा, गो सेवा एवं ब्राह्ममण सेवा आदि है । मौके पर प्रवचन स्थल पर सभी श्रद्धालु लोग उपस्थित थे।

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