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अब फकत लफ़्ज़ों से जो बन पायेगा कह‌ लेगे, अपनी आवाज का खुद हमने गला घोंट दिया


उन्नाव जिला ब्यूरो चीफ अवधेश कुमार की रिपोर्ट

समय के समन्दर में लगातार रिश्तों का बवंडर तबाही मचा रहा है कलयुग अब सब कुछ सामने दिखा रहा है। रामचन्द्र कह ग्रे सिया से एक दिन कलयुग आयेगा हंस चुनेगा दान पानी कौआ मोती खायेगा?सच की सतह पर वास्तविकता की लहरें लगातार ठोकर मार रही है। गिरावट मिलावट का सूचकांक सबसे नीचे स्तर का रिकार्ड दर्ज करा रहा है। सियासत से लेकर विरासत तक में नफासत का बोलबाला है। विभाजित होता‌ हिन्दू परिवार खत्म होता पुरातन संस्कार घर के बड़े बुजुर्गो का तिरस्कार मां बाप के अरमानों का गला घोंटते अपना ही खून जिसके ख्वाबो को पूरा करने के लिये जीवन भर सुख सुबिधा छोड़कर घर बार भटकते रहे आज आखरी समय में झेल रहे हैं तिरस्कार?जिसको अपना समझा पराया हो गया! अरमानों के आसमान पर आस के बादलों का सफाया‌ हो गया।? गुम हो गए संयुक्त परिवार!

  • एक वो दौर था जब पति, 
  • अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर

घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था !पत्नी की छनकती पायल और खनकते कंगन बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थी।बाऊजी की बातों का.हाँ बाऊजी जी बाऊजी"के अलावा दूसरा जवाब नही होता था ?आज बेटा बाप से बड़ा हो गया!रिश्तों का केवल नाम रह गया!ये समय-समय की नही,समझ-समझ की बात है!पहले लोग बीवी से तो दूर, बड़ो के सामने, अपने बच्चों तक से बात नही करते थे! आज बड़े बैठे रहते हैं उनके सामने ही आती आवाज हाय जानू !हाय जानम !आम बात हो गयी है। दादाजी के कंधे तो मानो, पोतों-पोतियों के लिए आरक्षित होते थे!चाचा ही भतीजों के दोस्त हुआ करते थे।

आज बदलते परिवेश में घर की कभी शान मर्यादा जिनके नाम पर समाज में पहचान बनी वृद्धाश्रम की पहचान बन रहे हैं। चाचा चाची बस सम्बन्धो की सूची का नाम भर रह गया है। दर्द के दहलीज पर सिसक‌ सिसक जिन्दगी के हसीन पल को मशीन के तरह करके जब सन्तान को किसी लायक बना दिया?जिस माली ने अपने खून पसीने से गृहस्थी के बगीचे को सींच कर पुष्पित पल्लवित कीया आज वक्त का खेल देखिये अपने ही बसाई दुनियां में तन्हा हो गया? वाह मालिक क्या तेरी रज़ा है?हर कोई भोग रहा अपने कर्मों की सजा है।

आज के दौर में उम्मीदे वफ़ा किससे करें ?धूप में बैठे हैं खुद पेड़ लगाने वाले? हालात कितना बदल गया रिश्ते स्वार्थ की दुनियां में बेमानी हो गये!अब न रिश्तेदार घर आते हैं!न भयवद्दी में पट्टीदार भात खाते हैं! सभी केवल रश्म निभाते हैं! तीज' त्योहार‌, होली, फगुआ, सतुआन, रक्षा बन्धन भी स्नेह का बन्धन नहीं स्वार्थ के वशीभूत महज अभिनन्दन बनकर रह गया? कीतना बदल गये है लोग!जब की सम्बन्धो का परम्परागत है रोग!अब तो लफ्जो का खेल है साहब! आया राम गया राम का जमाना है! हर कोई अपनों में दीवाना है! बस मां बाप ही घर परिवार में बेगाना है।आने वाली नस्लों को पता भी नहीं होगा संयुक्त परिवार कौन सी बला है कभी घर परिवार के मुखीजा दादा दादी हुआ करते थे।आज का पारिवारिक सम्बन्ध बिबाह‌ के दिन तक ही सीमित होकर रहा गया?समाज के बदलते परिवेश को देखकर गुजरा वक्त बारहा‌ याद आता है मगर सब कुछ कल की बात होकर रह गया है। अब तो बात वही है । 

  • खिजां के दौर को कब‌तक बहार कहोगे तुम ।
  • पत्थर के ढेर को कब तक पहाड़ कहोगे तुम ।।

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