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भगवान सूर्य देव और प्रकृति की उपासना मकर संक्रांति एवं उत्तरायण के पावन पर्व मकर संक्रांति संपन्न


सोनो जमुई संवाददाता चंद्रदेव बरनवाल की रिपोर्ट
  

सनातन धर्म में मकर संक्रांति का बहुत ही महत्व है । पौष मास में जब सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करते हैं तभी इस पर्व को मनाया जाता है । देशभर में मकर संक्रांति  का पर्व अलग अलग तरह से मनाया जाता है । मकर संक्रांति का जहां वैज्ञानिक महत्व है वहीं इस पर्व को मनाने के पीछे धार्मिक मान्यताएं भी हैं । मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी का धरती पर अवतरण हुआ था । यही वजह है कि इस दिन गंगा नदी में स्नान करने का बहुत बड़ा महत्व माना जाता है । यह पर्व भारतीय ज्योतिष के अनुसार पिता सूर्य और पुत्र शनि की मुलाकात के रूप में भी मनाया जाता है । ज्योतिषीय गणना के अनुसार गुरु की राशि धनु में विचरने वाले सूर्य ग्रह जब मकर यानी की शनिदेव राशि में प्रवेश करते हैं तो माना जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने खुद उनके घर जाते हैं । यही वजह है कि इस खास दिन को मकर संक्रांति के नाम से पहचाना जाता है । दूसरी मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जा मिली थीं । कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस खास दिन को तर्पण किया था । उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी । यही वजह है कि मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है । महाभारत के भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के मकर राशि मे आने का इंतजार किया था । सूर्य के उत्तरायण के समय देह त्याग करने या मृत्यु को प्राप्त होने वाली आत्माएं कुछ काल के लिए देवलोक में जाती हैं । जिससे आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा मिल जाता है और इसे मोक्ष प्राप्ति भी कहा जाता है । अतः इस पर्व को मनाने के पीछे यह मान्यता भी है । कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा करते हुए सभी असुरों के सिर को मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया था । पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने मधुकैटभ राक्षस को पराजित कर उसका वध किया और उसे यह कहकर विशाल मंदार के नीचे दबा दिया कि वह पुन: विश्व को आतंकित न करे । दूसरी तरफ महाभारत में वर्णित है कि समुद्र मंथन में देव और दानवों के पराजय के प्रतीक के रूप में ही हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर यह मेला लगता है । इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता के अंत का दिन भी माना जाता है । माता यशोदा ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत रखा था तब सूर्य देवता उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति का दिन था । माना जाता है कि उसी दिन से मकर संक्रांति के व्रत को रखने का प्रचलन भी शुरू हुआ । 

( डॉ सुबोध कुमार गुप्ता सोनो की कलम से )

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