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तिलकामांझी का त्याग बलिदान और समर्पण अतुलनीय


सोनो जमुई संवाददाता चंद्रदेव बरनवाल की रिपोर्ट

 अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल फूंकने वाले महान क्रांतिकारी पुरखा आदिवासी लड़ाकु वीर बलिदानी एवं मां भारती के वीर सपूत शहीद तिलकामांझी जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटी नमन करते हुए सोनो बाजार के समाज सेवी सह डॉ सुबोध कुमार गुप्ता ने बताया कि तिलकामांझी का त्याग बलिदान और समर्पण अतुलनीय है । तिलका मांझी का योगदान देश के स्वन्त्रता संग्राम में अग्रणी है । इतिहास में तिलकामांझी का नाम महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाना जाता है । उन्होंने बताया कि भारतीय इतिहास में सबसे बड़े स्वतंत्रता सेनानी और योद्धा के रूप में तिलकामांझी का नाम दर्ज है । तिलका मांझी ना सिर्फ आदिवासी समुदाय का अपितु पूरे देश का गौरव हैं । देश के हर समाज हर वर्ग के लोगों को वीर तिलकामांझी पर गर्व है । महान क्रांतिकारी तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज स्थित तिलकपुर गांव के एक संथाल परिवार में हुआ था । उनका मूल नाम जबरा पहाड़िया था , उन्हें ब्रिटिश सरकार ने तिलका मांझी नाम दिया । पहाड़िया भाषा में तिलका का अर्थ है गुस्सैल और लाल लाल आंखों वाला व्यक्ति होता है । जबरा अपने गांव के प्रधान भी थे । पहाड़िया समुदाय में ग्राम प्रधान को मांझी कहकर पुकारने की प्रथा है । तिलका नाम उन्हें अंग्रेज़ों ने दिया । अंग्रेज़ों ने जबरा पहाड़िया को खूंखार डाकू और गुस्सैल तिलका मांझी ( समुदाय प्रमुख ) कहा । स्वतंत्रता संघर्ष के बीज सबसे पहले वीर तिलका ने ही बोये थे । जिस समय ब्रिटिश सल्तनत ने साम , दाम , दंड भेद की नीति अपनाकर भारत के चप्पे चप्पे पर अपना व्यापारिक राज्य बढ़ा रही थी । उस समय बिहार के जंगलों में कोई था जो उनके खिलाफ आंधी बहा रहा था । अंग्रेज़ो से गोरिल्ला युद्ध के माध्यम से उनकी धन संपत्ति छुड़ा लेना और उसे निर्धन वंचितों को बांट देना उनकी दिनचर्या थी । उन्होंने अंग्रेजों से हथियार छुड़ाकर अपने साथियों को सशस्त्र बनाने के लिए बड़े प्रसिद्ध हो गए थे तिलका मांझी । तिलकामांझी ने प्रसिद्ध आदिवासी विद्रोह का नेतृत्त्व करते हुए 1771 से 1784 तक अंग्रेजों से लम्बी लड़ाई लड़ी तथा 1778 ई० में पहाडिय़ा सरदारों से मिलकर रामगढ़ कैंप को अंग्रेजों से मुक्त कराया । 

1784 में तिलकामांझी ने राजमहल के मजिस्ट्रेट क्लीवलैंड को मार डाला । इसके बाद आयरकुट के नेतृत्व में तिलकामांझी की गुरिल्ला सेना पर जबरदस्त हमला हुआ , जिसमें उनके कई लड़ाके मारे गए। उसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना लिया ।

13 जनवरी 1785 को भागलपुर के तिलकामांझी चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष में लटकाकर उन्हें फांसी दे दी गई । तिलकामांझी चौक पर उनकी आदमकद प्रतिमा उनकी वीरगाथा और शहादत की याद दिलाती है । उनके संघर्ष और देशभक्ति को संपूर्ण भारतीय नमन करते हैं ।

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