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संविधान निर्माता के साथ दिग्गज अर्थशास्त्री भी थे डॉ अंबेडकर


सोनो जमुई संवाददाता चंद्रदेव बरनवाल की रिपोर्ट

संविधान निर्माता , समाज सुधारक , महान विचारक , दिग्गज अर्थशास्त्री , भारत रत्न बाबा साहब डॉ० भीमराव अंबेडकर की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए सोनो बाजार के समाज सेवी सह डॉ सुबोध कुमार गुप्ता ने बताया कि समाज के पिछड़े व वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए डॉ भीमराव अम्बेडकर ने कड़ा संघर्ष किया जो हर पीढ़ी के लिए एक मिसाल बना रहेगा । डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का नाम आते ही भारतीय संविधान का जिक्र अपने आप आ जाता है । पूरी दुनिया आमतौर पर उन्हें या तो भारतीय संविधान के निर्माण में अहम भूमिका के नाते याद करती है या फिर भेदभाव वाली जाति व्यवस्था की प्रखर आलोचना करने और सामाजिक गैर बराबरी के खिलाफ आवाज उठाने वाले योद्धा के तौर पर । श्री गुप्ता ने आगे कहा कि इन दोनों ही रूपों में डॉक्टर अंबेडकर की बेमिसाल भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता , लेकिन डॉक्टर अंबेडकर ने एक दिग्गज अर्थशास्त्री के तौर पर भी देश और दुनिया के पैमाने पर बेहद अहम योगदान दिया , जिसकी चर्चा कम ही होती है । आज भले ही ज्यादातर लोग उन्हें भारतीय संविधान के निर्माता और दलितों के मसीहा के तौर पर याद करते हों , लेकिन डॉ अंबेडकर ने अपने कैरियर की शुरुआत एक अर्थशास्त्री के तौर पर की थी । डॉ अंबेडकर किसी अंतरराष्ट्रीय यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी हासिल करने वाले देश के पहले अर्थशास्त्री थे । उन्होंने 1915 में अमेरिका की प्रतिष्ठित कोलंबिया यूनिवर्सिटी से इकॉनमिक्स में एमए की डिग्री हासिल की । इसी विश्वविद्यालय से 1917 में उन्होंने अर्थशास्त्र में पीएचडी भी की । इतना ही नहीं इसके कुछ वर्षों के बाद भी उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स से भी अर्थशास्त्र में मास्टर और डॉक्टर ऑफ साइंस की डिग्रियां हासिल कीं । खास बात यह है कि इस दौरान बाबा साहब ने दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से डिग्रियां हासिल करने के साथ ही अर्थशास्त्र के विषय को अपनी प्रतिभा और अद्वितीय विश्लेषण क्षमता से लगातार समृद्ध भी किया । डॉ अंबेडकर ने 1915 में एमए की डिग्री के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी में 42 पेज का एक डेज़र्टेशन सबमिट किया था , एडमिनिस्ट्रेशन एंड फाइनेंस ऑफ द ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से लिखे गए इस रिसर्च पेपर में उन्होंने बताया था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के आर्थिक तौर तरीके आम भारतीय नागरिकों के हितों के किस कदर खिलाफ हैं । कई विद्वानों का मानना है कि एमए के एक छात्र के तौर पर लिखे गए इस रिसर्च पेपर में डॉ अंबेडकर ने जिस तरह बेजोड़ तार्किक क्षमता के साथ दलीलें पेश की हैं वो उनकी बेमिसाल प्रतिभा का सबूत हैं । अंबेडकर ने इस रिसर्च पेपर में ब्रिटिश राज की नीतियों की धारदार आलोचना करते हुए तथ्यों और आंकड़ों की मदद से साबित किया है कि ब्रिटेन की आर्थिक नीतियों ने भारतीय जनता को किस तरह बर्बाद करने का काम किया है । उन्होंने यह भी बताया है कि अंग्रेजी राज ट्रिब्यूट और ट्रांसफर‌ के नाम पर किस तरह भारतीय संपदा की लूट करता रहा है । अंबेडकर ने इस लेख में ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों भारतीय जनता के शोषण को जिस तरह ठोस आर्थिक दलीलों के जरिये साबित किया है , वह उनकी गहरी देशभक्ति की मिसाल है । एमए के युवा छात्र के तौर पर लिखे गए डॉक्टर अंबेडकर के इस रिसर्च पेपर की तुलना कई विद्वान दादा भाई नौरोजी की किताब पॉवर्टी एंड अन ब्रिटिश रूल इन इंडिया से भी करते हैं । जिसमें भारतीय संपदा की अंग्रेजी राज में हुई लूट का विश्लेषण करने वाली पहली अहम किताब माना जाता है ।बाबा साहब ने बरसों पहले पीएचडी की थीसिस के तौर पर केंद्र और राज्यों के वित्तीय संबंधों के बारे में जो तर्क और विचार पेश किए , उसे आजादी के बाद भारत में केंद्र और राज्यों के आर्थिक संबंधों का खाका तैयार करने के लिहाज से बेहद प्रासंगिक माना जाता है । कई विद्वानों का तो मानना है कि भारत में वित्त आयोग के गठन का बीज डॉ अंबेडकर की इसी थीसिस में निहित है । एक अर्थशास्त्री के तौर पर डॉ० अंबेडकर की सबसे चर्चित किताब है / द प्रॉब्लम ऑफ द रुपी इट्स ओरिजिन एंड इट्स सॉल्यूशन /1923 में प्रकाशित हुई इस किताब में अंबेडकर ने जिस धारदार तरीके से अर्थशास्त्र के बड़े पुरोधा जॉन मेयनॉर्ड कीन्स के विचारों की आलोचना पेश की है वह इकनॉमिक पॉलिसी और मौद्रिक अर्थशास्त्र पर उनकी जबरदस्त पकड़ का प्रमाण है । कीन्स ने करेंसी के लिए गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड की वकालत की थी । जबकि अंबेडकर ने अपनी किताब में गोल्ड स्टैंडर्ड की जबरदस्त पैरवी करते हुए उसे कीमतों की स्थिरता और गरीबों के हित में बताया था ।

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