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हम उस दौर से गुजर रहे हैं जनाब, जहां साथी बहुत है साथ कोई नही


उन्नाव जिला ब्यूरो चीफ अवधेश कुमार की रिपोर्ट

आधुनिकता की आंधी अब‌ सुनामी बन चुकी है भारतीय‌ सभ्यता‌ की धज्जियां जम कर‌‌ उडाई‌ जा रही है।एक तरफ भारतीय‌ पाश्चात्य‌ सभ्यता का अनुसरण कर रहे हैं। तो वहीं पाश्चात्य सभ्यता को त्याग कर बिदेशी भारतीय सभ्यता‌ को‌ अंगीकार कर‌ रहे है। सनातनधर्म को स्वीकार‌ कर‌‌ रहे है‌। उनका रहन सहन पहनावा‍ बदल रहा‌‌ है। अपने मूल को छोडकर‌ समूल‌ बिनाश का खेल‌ शुरू‌ है‌। कभी यही सनातनी भारत‌ बना रहा विश्व गुरु है। वास्तविकता‌ के धरातल पर जिस तरह भारतीय सभ्यता का विलोपन हो रहा है‌‌ भारतीय‌ संस्कृति बदल रही‌‌ है उससे तो जगजाहीर‌ है वक्त के साथ‌ सब कुछ बदलजायेगा? भारतीय परिवेश जहां सद्भाव सद्भावना का निवेश उन्मेष की अंगड़ाई लेता था। आज वही भारत देश है जहां विद्वेश‌ विघटन का खेल‌‌ चल‌ रहा है।सियासत‌ के शागिर्द ‌आजादी‌ के समय‍‌ ही बर्बादी का बीज‌ बिखेर दिये जो आज इस‌ देश की‌‌ सम्प्रभुता के लिये खतरा‌ बन गया है?।सर्वनाश का पैमाना हर तरफ छलक रहा है! हम आप अपने‌ धर्म संस्कृति से मुंह मोड़ रहे हैं! अपनी पुरातन ब्यवस्था‌ को छोड़ रहे हैं? कहा गया‌ है जो कौम अपने‌ धर्म संस्कृति से विरक्त हो जाती है उसकी बर्बादी सुनिश्चीत है।आज का परिवेश आधुनिकता के निवेश में बिशेष बदलाव के बहाव के तरफ अग्रसर‌ है।आधुनिकता का जहर फैला गया घर घर है?। संयुक्त परिवार बिलुप्त हो रहें है‌! एकाकी जीवन पद्धति की परम्परा परवान चढ़ रही हैं।फैसन परस्ती के नाम पर निर्लज्जता आसमान चढ़ रही है।बड़ा छोटा मां बाप का लाज लिहाज आज खत्म हो रहा है। घर घर आपस में लफड़ा! देह उघारु कपड़ा!फैसन परस्ती का पैमाना बन गया! शर्म हया‌ का तिरस्कार करने वाली आधुनिक पीढ़ी हर कदम पर दुर्बवस्था का शिकार हो रही है। अपराध दुराचार अनाचार दुर्ब्यवहार आम बात हो गयी! आज के युवा बेपर्दा रह कर मर्यादित जीवन की कल्पना कैसे कर सकते हैं?। जब पर्दा बिहीन समाज  का आगाज निर्वाध गति से आगे बढ़ रहा है?जरा गौर से देखे इस माहौल के बीच हर आदमी ब्यस्त है! मस्त है! सबके साथ में मोबाईल है!सैकड़ों दोस्त की फेहरिस्त है? मगर साथ निभाने वाला कोई नहीं इसका आधुनिक समाज होता जा रहा अभ्यस्त है।पूरा परिवार‌ मोबाईल में वह‌ सब कुछ देख रहा‌‌ है जो सभ्य समाज में प्रतिबन्धित है।हर‌‌ कोई‌ मोबाईल के पिक्चर, मैसेज को देखकर ही हो रहा आनन्दित है।मां बाप के सामने ही जवान बेटी‌ का आचरण हो रहा अमर्यादित है !फिर भी कोई नहीं होता लज्जित है? आखिर‌ हम कहां चले जा रहे हैं। सती अनुसुइया का अनुश्रवण अब कौन करता‌‌?सीता की अग्नि परीक्षा की बात‌ ही बेमानी है‌।ब्वाय फ्रेंड का टेन्ड‌ अपने जीवन साथी के रहते हुते भी‌ चलन में आ गया! दुसरो के साथ मौज-मस्ती फैसन परस्ती बन गया!शादी बिबाह मे‌‌ घर की इज्जत को जयमाल के नाम सरेयाम नीलाम करना बहुभोज के नाम पर चेहरा का प्रदर्शन खुलेयाम करना आधुनिकता की निशानी बन गया! और वही से घर‌ के बिंघटन का बीज अंकुरित होकर महज‌ छ माह‌ मे‌ ही परेशानी बन गया सबब है!इस‌ सबके  जिम्मेदार‌ हम आप खुद है! दान दहेज से किसी को नही‌ परहेज पागलपन की हद तक जा रहा है आदमी? और उसी का फल चन्द दिनों में पा रहा है आदमी! सारा कुछ बहु बेटा‌ के हिस्सा‌ मे‌ मूफ्त बदनाम होता मुखिया!जीवन भर दर्द झेलता है बन कर दुखिया! सब कुछ बदल रहा है।जब तक पुरातन ब्यवस्था में आस्था का प्रतिपादन नहीं होगा? तब तक सम्बृध परीवार में एकता का सम्पादन नहीं होगा!आज हम आप चाहें जितना भी बड़ापन का कसीदा पढ़ लें! लेकिन जो पुरातन पीढ़ी ने जो समाज को दिया उसका अनादर जम कर आधुनिक समाज‌ कर रहा है! वह इज्जत वह शोहरत कभी नसीब‌ नही होगी? आज संयुक्त परिवार बिखर रहा है! मां बाप का अनादर घर घर हो रहा है! पुश्तैनी पहचान अनजान होती जा रही है। गांवों से नाता रिश्ता खतम‌ हो रहा‌‌ है! आज का आदमी अपने बर्बादी का बीज‌ खुद बो रहा‌‌ है।अब कोई समाज है न कोई भाई न पट्टीदार है!शहर में बसकर बस तन्हा जीवन है! नाता रिश्ता केवल ससुराल है! आजकल वृद्धा आश्रमों में भीड़ चल‌ रही  है।अनाथालयों में जगह नही‌‌ है!हर आदमी बेचैन है‌ इस‌ बर्वादी की रूकने की‌‌अब कोई वजह‌ नहीं है!जो बोया उसक़ काटना है! जो खाई खोदा उसको पाटना है।अब कौन आखरी वक्त का साथी होगा? जब साथ निभाने वालों का परित्याग कर दिया!सब कुछ गांव गिराव छोड़कर शहर में आबाद कर लिया!विकृत होते समाज में सिसक सिसक कर जीना अब दिन चर्या में शामिल हो गया है!हर कोइ दुखी है।कोई नही सुखी है। समय का चक्र अबाध गति से अपनी मन्जिल के तरफ बढ़ रहा है। परिवर्तन नर्तन कर रहा है?समय के साथ साथ खुद को आत्मसात करते अनन्त पथ का अनुगामी बनना ही नियत है!संयमित रहे सुरक्षित रहे!वर्तमान हर कदम पर इम्तिहान ले रहा है।समय रहते जो नहीं सम्हल पाया वो सब कुछ लुटाकर उसके हिस्से में केवल दर्द आया।इस मतलबी जहां मे कोई अपना नहीं!आखरी वक्त का कोई साथी नहीं? वहीं साथ जायेगा जो गरीब दुखिया में लुटाया है।

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