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ग्रामीण क्षेत्रों में धड़ल्ले से बन और बिक रही शराब

  • पुलिस की सख्ती बढ़ी तो धंधेबाज प्लास्टिक पैकेट में करने लगे डिलेवरी


कुर्था
अरवल,सूबे में भले ही शराबबंदी का दावा किया जाता हो, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। अब भी चोरी-छिपे शराब बनाई और बेची जा रही है। हालांकि पुलिस का दावा है कि शराब का धंधा करने वालों पर कार्रवाई हो रही है। सोमवार को जब पत्रकारों की टीम ने कुर्था प्रखंड के वैसे ग्रामीण इलाकों की पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। पड़ताल में यह बात सामने आई कि बिहार में शराबबंदी के बाद भी शराब न सिर्फ बिक रही है, बल्कि अवैध तरीके से बनाई भी जा रही है। रविवार सुबह 8 से 11 बजे तक कई इलाकों में पत्रकारों की टीम कुर्था और आसपास के इलाके में ग्राहक बनकर गई तो  एक महादलित महिला मिली। उनसे एक लीटर शराब की कीमत 100 रु बताई। कहा ग्राहक के जिद करने पर 80 रुपए में भी दे देते हैं। महिला ने बताया कि 175 रुपए का सामान लगता है। उसमें 4 लीटर शराब तैयार करते हैं, उसमें 4 लीटर पानी मिलाने के बाद 8 लीटर शराब तैयार हो जाता है। 80 रुपए लीटर की दर से 640 रुपए आमदनी होती है। यानी लगभग 4 गुना अधिक मुनाफा होता है। महिला से जब पूछा गया कि क्या यह महुआ शराब है तो उसने कहा कि अब महुआ शराब कहां बनती है। अब तो गुड़ देकर चुलाई शराब बनाई जाती है। आसपास के लोगों से पूछा गया कि यहां पीने के लिए लोग कब आते हैं तो एक व्यक्ति ने नाम नही छापने के सर्त पर बताया कि शाम के 4 बजे से रात के 8 बजे तक जमावड़ा लगता है। उसने बताया कि पिछले दो महीने से सरकार और पुलिस की सख्ती के बाद यहां बैठकर पीने नहीं दिया जाता है। पॉलिथीन में शराब पैककर लोग ले जाते हैं।

शराब बनाने और बेचने के धंधे में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण

कुर्था प्रखंड के निघमा, खेमकरण सराय नगर पंचायत, नदौरा, इब्राहिमपुर, बारा, अहमदपुर हरना धमौल कोदमरई आदि पंचायतो के कई गाबो में महुआ निर्मित शराब का कारोबार बड़े पैमाने पर हो रहा है। इन ग्रामीण इलाकों में शाम को पियक्कड़ों की भीड़ लगती है। हालांकि पुलिस की भय से कारोबारियों ने तरीका जरूर बदला है, लेकिन कारोबार में कमी नहीं है। छोटे छोटे पॉलिथीन में आधा लीटर एक लीटर का पाउच बना कर खेत और जंगल में रखा जाता है, जिसे पैसा लेने के बाद ग्राहकों को दिया जाता है, लेकिन वहां पीने की साफ मनाही है। खास बात ये है कि इस धंधे में महिलाओं की भूमिका बडे तौर पर है, और पुरुष सुरक्षा के लिए साथ रहते हैं। एक कारोबारी महिला ने बताया कि गुड़ को चार दिन सड़ने दिया जाता है, फिर उसमें बाखर और नशे के लिए टेबलेट मिलाया जाता है। फिर भट्ठी पर उससे शराब बनाई जाती है।

दलित और महादलित समुदाय के अधिक लोग इस कारोबार में जुड़े ग्रामीण बताते हैं कि अवैध शराब निर्माण के मामले में अधिकांश जगहों पर दलित समुदाय और महादलित समुदाय के लोग जुड़े हुए हैं। हालांकि अंग्रेजी शराब की डिलीवरी में हर तबके के लोग खासकर पुरुष वर्ग अधिक शामिल हैं। लोगों ने यह भी बताया कि कम लागत में अधिक मुनाफा होने की वजह से इन समुदाय के लोग इस धंधे में अधिक से अधिक जुड़ रहे हैं, जिस वजह से खेत में काम करने वाला मजदूर भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

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