Breaking News

राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के प्रतीक थे डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी:- बिकास

  • भाजपा ने मनाया डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 69 वीं पुण्यतिथि


सोनो जमुई संवाददाता चंद्रदेव बरनवाल की रिपोर्ट

  • राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के प्रतिक थे डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी - बिकास ‌
  • जमुई के मंझवे पंचायत अंतर्गत नवीनगर बाजार में मनाया गया मुखर्जी का बलिदान दिवस 

भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य व पूर्व जिला पार्षद बिकास प्रसाद सिंह के द्वारा गुरुवार को जमुई के मंझवे पंचायत अंतर्गत नवीनगर गांव के महादलित मुहल्ले में भारतीय जनसंघ के संस्थापक महामानव डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस मनाया गया ।

मौके पर उपस्थित कार्यकर्ता व ग्रामीणों को संबोधित करते हुए श्री सिंह ने कहा कि मुखर्जी साहब 6 जुलाई 1901 को कोलकाता के अति प्रतिष्ठित परिवार में जन्म हुआ । उनके पिता आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे एवं शिक्षाविद के रूप में विख्यात थे । डॉ० मुखर्जी लॉ के बाद उच्च शिक्षा हेतु 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे । अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही विद्या अध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित कर ली थीं । 

33 वर्ष की आयु में वे कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति बने । एक विचारक तथा प्रखर शिक्षाविद के रूप में उनकी उपलब्धि तथा ख्याति निरन्तर आगे बढ़ती गयी ।

भाजपा नेता श्री सिंह ने आगे कहा कि डॉ॰ मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी थे । उन्होने बहुत से गैर कांग्रेसी हिन्दुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी से मिलकर प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण किया । इस सरकार में वे वित्त मन्त्री बने । इसी समय वे सावरकर के राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए । राष्ट्रीय हितों की प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मंत्री मण्डल से त्यागपत्र दे दिया । उन्होंने एक नई पार्टी बनायी जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बड़ा दल था । अक्टूबर‌ 1951 में भारतीय जनसंघ का उद्भव हुआ ।

डॉ॰ मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे । उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था । वहां का मुख्य मंत्री अर्थात‌ प्रधानमन्त्री कहलाता था। संसद में अपने भाषण में डॉ॰ मुखर्जी ने धारा 370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की थी । अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त करते हुए कहा कि मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। उन्होंने तात्कालिन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 

23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी हत्या कर दी गई । उक्त कार्यक्रम में पंचायती राज प्रदेश कार्यसमिति सदस्य नरेंद्र सिंह , युवा मोर्चा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य ठाकुर दुगडुग सिंह , पिछड़ा मोर्चा के पूर्व जिला महामंत्री मनोज साव , विद्यार्थी परिषद के राहुल सिंह , संजय बर्णवाल , वार्ड सदस्य सागर कुमार , क्रीड़ा मंच प्रदेश कार्यसमिति सदस्य दिवाकर चंद्रवंशी , शम्भूपाल जी , कुंदन कुमार , लालू मांझी , रणधीर मांझी , लालजीत सिंह , विजय मांझी , दिवेश मांझी तथा मिठू मांझी सहित अन्य लोगों ने शामिल होकर श्रद्धा सुमन अर्पित किया।

कोई टिप्पणी नहीं

Type you comments here!